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هزاران غم بدل اندوته دیرم
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هزار آتش بجان افروته دیرم
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بیک آه سحر کز دل برآرم
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هزاران مدعی را سوته دیرم
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بیته گلشن به چشمم گلخن آیو
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واته گلخن به چشمم گلشن آیو
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گلم ته گلبنم ته گلشنم ته
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که واته مرده را جان بر تن آیو
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غم عشقت ز گنج رایگان به
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وصال تو ز عمر جاودان به
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کفی از خاک کویت در حقیقت
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خدا دونه که از ملک جهان به
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سر سرگشتهام سامان نداره
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دل خون گشتهام درمان نداره
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به کافر مذهبی دل بسته دیرم
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که در هر مذهبی ایمان نداره
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امان از اختر شوریدهی مو
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فغان از بخت برگردیدهی مو
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فلک از کینه ورزی کی گذاره
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رود خون از دل غمدیدهی مو
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بروی ماهت ای ماه ده و چار
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به سرو قدت ای زیبنده رخسار
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که جز عشقت خیالی در دلم نی
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بدیاری ندارم مو سر و کار
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نهالی کن سر از باغی برآرد
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ببارش هر کسی دستی برآرد
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برآرد باغبان از بیخ و از بن
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اگر بر جای میوه گوهر آرد
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غمت در سینهی مو خانه دیره
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چو جغدی جای در ویرانه دیره
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فلک هم در دل تنگم نهد باز
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هر آن انده که در انبانه دیره
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کشم آهی که گردون پر شرر شی
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دل دیوانهام دیوانهتر شی
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بترس از برق آه سوته دیلان
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که آه سوته دیلان کارگر شی
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شبی ناید ز اشکم دیده تر نی
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سرشکم جاری از خون جگر نی
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شو و روجم رود با نالهی زار
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ته را از حال زار مو خبر نی
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غم و درد دل مو بی حسابه
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خدا دونه دل از هجرت کبابه
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بنازم دست و بازوی ته صیاد
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بکش مرغ دلم بالله ثوابه
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بی تو تلواسه دیرم ای نکویار
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زهر در کاسه دیرم ای نکویار
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میم خون گریه ساقی ناله مطرب
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مصاحب این سه دیرم ای نکویار
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اگر دستم رسد بر چرخ گردون
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از او پرسم که این چین است و آن چون
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یکی را میدهی صد ناز و نعمت
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یکی را نان جو آلوده در خون
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چه باغ است اینکه دارش آذرینه
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چه دشت است اینکه خونخوارش زمینه
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مگر بوم و بر سنگین دلان است
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مگر صحرای عشق نازنینه
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کجا بی جای ته ای بر همه شاه
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که مو آیم بدانجا از همه راه
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همه جا جای ته مو کور باطن
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غلط گفتم غلط استغفرالله
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کسیکه ره بفریادم برد نی
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خبر بر سرو آزادم برد نی
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همه خوبان عالم جمع گردند
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کسیکه یادت از یادم برد نی
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به هر شام و سحر گریم بکوئی
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که جاری سازم از هر دیده جوئی
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مو آن بی طالعم در باغ عالم
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که گل کارم بجایش خار روئی
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سمن زلفا بری چون لاله دیری
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ز نرگس ناز در دنباله دیری
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از آن رو سه بمهرم بر نیاری
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که در سرناز چندین ساله دیری
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شبی نالم شبی شبگیر نالم
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ز جور یار و چرخ پیر نالم
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گهی همچون پلنگ تیر خورده
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گهی چون شیر در زنجیر نالم
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وای آن روزی که قاضی مان خدا بی
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به میزان و صراطم ماجرا بی
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بنوبت میروند پیر و جوانان
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وای آنساعت که نوبت زان ما بی
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دل ارمهرت نورزه بر چه ارزه
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گل است آندل که مهر تو نورزه
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گریبانی که از عشقت شود چاک
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بیک عالم گریبان وابیرزه
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برویت از حیا خوی ریته دیری
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دو ابرویت بناز آمیته دیری
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به سحر دیده در چاه زنخدان
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بسی هاروت دل آویته دیری
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ز آهم هفت گردون پر شرر بی
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زمژگانم روان خون جگر بی
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ته که هرگز دلت از غم نسوجه
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کجا از سوته دیلانت خبر بی
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سحرگاهان که اشکم لاوه گیره
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زآهم هفت چرخ آلاوه گیره
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چنان از دیده ریزم اشک خونین
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که گیتی سر بسر سیلابه گیره
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عزیزان موسم جوش بهاره
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چمن پر سبزه صحرا لاله زاره
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دمی فرصت غنیمت دان درین فصل
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که دنیای دنی بی اعتباره
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مرا درد آموه و درمان چه حاصل
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مرا وصل آموه و هجران چه حاصل
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بسوته بی گل و آلاله بی سر
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سر سوته کله یاران چه حاصل
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دلا از دست تنهایی بجانم
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ز آه و نالهی خود در فغانم
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شبان تار از درد جدایی
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کند فریاد مغز استخوانم
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غم عشق تو مادر زاد دیرم
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نه از آموزش استاد دیرم
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بدان شادم که از یمن غم تو
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خراب آباد دل آباد دیرم
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الهی سوز عشقت بیشتر کن
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دل ریشم ز دردت ریشتر کن
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ازین غم گر دمی فارغ نشینم
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بجانم صد هزاران نیشتر کن
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غمم بیحد و دردم بی شماره
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فغان کاین درد مو درمان نداره
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خداوندا ندونه ناصح مو
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که فریاد دلم بیاختیاره
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عزیزان از غم و درد جدایی
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به چشمانم نمانده روشنائی
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بدرد غربت و هجرم گرفتار
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نه یار و همدمی نه آشنائی
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نصیب کس مبو درد دل مو
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که بسیاره غم بیحاصل مو
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کسی بو از غم و دردم خبردار
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که دارد مشکلی چون مشکل مو
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به لامردم مکان دلبرم بی
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سخنهای خوشش تاج سرم بی
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اگر شاهم ببخشد ملک شیراز
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همان بهتر که دلبر در برم بی
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دلی دیرم خریدار محبت
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کز او گرم است بازار محبت
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لباسی دوختم بر قامت دل
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زپود محنت و تار محبت
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خوشا آنانکه تن از جان ندانند
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تن و جانی بجز جانان ندانند
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بدردش خو گرند سالان و ماهان
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بدرد خویشتن درمان ندانند
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دل مو بیتو زار و بی قراره
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بجز آزار مو کاری نداره
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زند دستان بسر چون طفل بدخو
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بدرد هجرت اینش روزگاره
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بوره بلبل بنالیم از سر سوز
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بوره آه سحر از مو بیاموز
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تو از بهر گلی ده روز نالی
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مو از بهر دلآرامم شو و روز
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خداوندا بفریاد دلم رس
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تو یار بیکسان مو مانده بیکس
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همه گویند طاهر کس نداره
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خدا یار مو چه حاجت کس
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دلی دیرم ولی دیوانه و دنگ
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ز دستم شیشهی ناموس بر سنگ
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ازین دیوانگی روزی برآیم
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که در دامان دلبر برزنم چنگ
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همه عالم پر از کرد چه سازم
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چو مو دلها پر از درد چه سازم
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بکشتم سنبلی دامان الوند
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همواز طالعم زرد چه سازم
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قدح بر گیرم و سیر گلان شم
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بطرف سبزه و آب روان شم
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دو سه جامی زنم با شادکامی
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وایم مست و بسیرلالیان شم
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مو از جور بتان دل ریش دیرم
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زلاله داغ بر دل بیش دیرم
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چو فردا نامه خوانان نامه خوانند
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من شرمنده سر در پیش دیرم
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دیم آلالهای در دامن خار
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واتم آلالیا کی چینمت بار
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بگفتا باغبان معذور میدار
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درخت دوستی دیر آورد بار
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خوشا آندل که از خود بیخبر بی
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ندونه در سفر یا در حضر بی
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بکوه و دشت و صحرا همچو مجنون
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پی لیلی دوان با چشم تر بی
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همه دل ز آتش غم سوتنی بی
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بهرجان سوز هجر افروتنی بی
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که از دست اجل بر تن قبائی
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اگر شاه و گدائی دوتنی بی
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قلم بتراشم از هر استخوانم
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مرکب گیرم از خون رگانم
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بگیرم کاغذی از پردهی دل
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نویسم بهر یار مهربانم
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محبت آتشی در جانم افروخت
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که تا دامان محشر بایدم سوخت
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عجب پیراهنی بهرم بریدی
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که خیاط اجل میبایدش دوخت
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الهی ار بواجم ور نواجم
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ته دانی حاجتم را مو چه واجم
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اگر بنوازیم حاجت روا بی
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وگر محروم سازی مو چه ساجم
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مو آن دلدادهی بی خانمانم
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مو آن محنت نصیب سخت جانم
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مو آن سرگشته خارم در بیابان
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که چون بادی وزد هر سو دوانم
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نمیدانم که رازم با که واجم
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غم و سوز وگدازم با که واجم
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چه واجم هر که ذونه میکره فاش
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دگر راز و نیازم با که واجم
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سر کویت بتا چند آیم و شم
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ز وصلت بی نوا چند آیم و شم
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بکویت تا ببیند دیده رویت
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نترسی از خدا چند آیم و شم
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بوره کز دیده جیحونی بسازیم
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بوره لیلی و مجنونی بسازیم
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فریدون عزیزم رفتی از دست
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بوره کز نو فریدونی بسازیم
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گلی که خود بدادم پیچ و تابش
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باشک دیدگانم دادم آبش
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درین گلشن خدایا کی روا بی
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گل از مو دیگری گیرد گلابش
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زعشقت آتشی در بوته دیرم
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در آن آتش دل و جان سوته دیرم
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سگت ار پا نهد بر چشمم ایدوست
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بمژگان خاک پایش روته دیرم
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به آهی گنبد خضرا بسوجم
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فلک را جمله سر تا پا بسوجم
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بسوجم ار نه کارم را بساجی
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چه فرمائی بساجی یا بسوجم
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اگر جسمم بسوزی سوته خواهم
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اگر چشمم بدوزی دوته خواهم
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اگر باغم بری تا گل بچینم
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گلی همرنگ و همبوی ته خواهم
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سر کوه بلند چندان نشینم
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که لاله سر بر آره مو بچینم
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الاله بیوفا بی بیوفا بی
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نگار بیوفا چون مو گزینم
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ز وصلت تا بکی فرد آیم و شم
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جگر پر سوز و پر درد آیم و شم
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بموگوئی که در کویم نیایی
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مو تا کی با رخ زرد آیم و شم
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خوشا روزی که دیدار ته وینم
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گل و سنبل ز رخسار ته چینم
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بیا بنشین که تا وینم شو و روز
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جمالت ای نگار نازنینم
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دلم زار و حزینه چون ننالم
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وجودم آتشینه چون ننالم
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بمو واجن که طاهر چند نالی
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چو مرگم در کمینه چون ننالم
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